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विद्यालयों को विद्यालय हीं रहने दीजिए, कार्यालय मत बनाइये।

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इतिहास गवाह है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बिहार के शिक्षण संस्थानों का कोई जोर नहीं। विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान, विशेष शिक्षा पद्धति और दक्ष शिक्षकों की वजह से यहाँ दुनिया भर के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। लेकिन मौजूदा दौर में ये बातें बस कहने सुनने भर हैं। यहां शिक्षा का स्तर इन दिनों इस कदर गिर गया है कि शब्दों में इसकी व्याख्या कर पाना मुश्किल है। अपने अनुभव के जरिये शिक्षा की इन्ही विसंगतियों पर प्रकाश डाल रही  हैं शिक्षिका भारती रंजन

बिहार में शिक्षा 4 दिसम्बर को राजकीयकृत माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्यों के वेतन वृद्धि के लिए आयोजित विभागीय परीक्षा में कुल 148 में से 122 का अनुतीर्ण होना, तीन का नकल करते हुए पकड़ा जाना बिहार के शिक्षा व्यवस्था, सरकार, शिक्षक, छात्र, समाज और अन्य पहलुओं के लिए भी खतरे की घण्टी है। ये बहुत ही विचारनीय विषय है कि इस शिक्षा के क्या घातक परिणाम हैं? मग़र उससे पहले इसके कारणों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। अगर हम अब भी नही जागे तो हमे समझ लेना चाहिए कि हम गर्त में गिर चुके हैं और उससे बाहर नही आना चाहते हैं।

क्या इसके लिए सिर्फ वो शिक्षक जिम्मेदार हैं? आज से दो दशक पहले की बात करें तो कम साधनों के बावजूद कितने प्रतिभावान छात्र हुए और अपने राज्य ही नही देश का भी नाम रौशन किया। मगर अब सारे सुविधाओं के बाद भी गुणवतापूर्ण शिक्षा कोशों दूर है। इसके लिए एक व्यक्ति या कोई एक संस्थान दोषी नही हो सकता।

इसके लिए सबसे पहले सरकारी प्रणाली दोषी है जो वोट और सत्ता की गन्दी राजनीति के लिए शिक्षा, शिक्षक और छात्र के भविष्य से खेल रही है। साईकिल, पोशाक, मुफ्त किताब, छात्रवृत्ति इत्यादि जैसी सरकारी योजनाओँ से वोट तो मिल जाते हैं लेकिन शिक्षा का स्तर नहीं। इन योजनाओं कारण विद्यालय बाजार बन गया है। प्राचार्यो का अधिकतर समय खाता लिखने और बैंकों के चक्कर काटने में चला जाता है। विद्यालय में अधिकांश शिक्षक हाजिरी बनाना हीं अपनी ड्यूटी समझते हैं, पढ़ाना नहीं। शिक्षक शिक्षक न रहकर एक क्लर्क बनकर रह गए हैं। क्या ऐसे में प्राचार्य या शिक्षक किसी भी परीक्षा में पास होंगे? जिनका पढ़ने पढ़ाने से कोई वास्ता ही नही रहा। लिहाजा कुछ शिक्षक तो परीक्षा के नाम पर ही डरते हैं। अब उन्हें सस्पेंड करने की बात हो रही है,मगर उसके साथ साथ क्या सरकार की शिक्षा नीति और व्यवस्था में सुधार नही होना चाहिए? सरकार सिर्फ चुनाव को मुद्दा बनाकर सबके भविष्य से खेलती है।

विद्यालय निरीक्षण के नाम पर जैमकर धांधली चल रही है जिसका असर कहीं ना कहीं शिक्षा पर पड़ रहा है। प्राथमिक विद्यालयों में MDM के कारण शिक्षक ही शिक्षक के दुश्मन हो गए हैं। एक कहता है मैं वरीय हूँ तो दूसरा कहता है मैं वरीय हूँ। अब इस लड़ाई में पठन-पाठन चौपट हो गया है। बात वेतन विसंगति की करें तो शिक्षा की बदहाली में यह भी एक मुख्य कारण है।

जहां तक बात अभिभावकों की है तो उनका जागरूक नही होना भी शिक्षा को मार्ग से भटका रही है। क्योंकि अभिभावक भी बच्चों को साईकिल,पोशाक, पैसे के लिए ही विद्यालय भेजते हैं न कि बच्चों को पढ़ने के लिए। बच्चों के मन मे पढ़ाई नही सरकारी सामान का प्रतिस्पर्धा है।

ऐसे में शिक्षा के गिरते स्टार के लिए सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं सिर्फ वो प्राचार्य ही दोषी क्यों? अगर वास्तव में  शिक्षा का स्तर सुधारना है तो सबकुछ सुधारिए न। उन्हें सस्पेंड करने से न शिक्षा सुधरेगी और न आपकी दोषपूर्ण व्यवस्था। सरकार की वोट की राजनिति बन्द हो जाएगी तो विद्यालयों में सरस्वती का निवास हो जाएगा नही तो लक्ष्मी जी का राज रहेगा।

बिहार में शिक्षा
ये पोस्ट शिक्षिका भारती रंजन कुमारी के फेसबुक वाल से साभार प्रस्तुत है।

 

 

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