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जानलेवा है जापानी इंसेफ्लाइटिस का वायरस, नहीं है कोई इलाज, वैक्सीन ही है उपाय

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जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) एक वायरल बीमारी है,जिसे दिमागी बुखार भी कहा जाता है। इसका प्रकोप ज्यादातर उन जगहों पर होता है,जहां चावल के खेत हैं या अधिकतक समय पानी भरा रहता है। 1 से 15 साल तक बच्चों में इस बीमारी के होने की संभावना ज्यादा रहती है, लेकिन वयस्क भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।

WHO की रिपोर्ट के अनुसार एशिया में हर साल करीब 70 हजार मरीज जैपनीज इंसेफ्लाइटिस के पाये जाते हैं। एक आंकड़े के अनुसार जिन बच्चों के जैपनीज इंसेफ्लाइटिस हो जाता है, उनमें से 50 प्रतिशत जीवित बच जाने के बाद भी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते और उनमें कई तरह के शारीरिक और मानसिक विकार जीवन भर पाये जाते हैं।

केस स्टडी :

पिछले सप्ताह ऑस्ट्रेलिया का एक 60 वर्षीय व्यक्ति थाइलैंड के फुकेट शहर से छुट्टियां मना कर आया। ऑस्ट्रेलिया पहुंचते ही उसकी तबियत खराब होने लगी। उसे तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी। जांच में पता चला कि उसे मच्छर ने काटा था, जिसके कारण वह जैपनीज इंसेफ्लाइटिस वायरस (JEV) की चपेट में आ गया था, जो दिमाग में इन्फेक्शन का प्रमुख कारक होता है। दरअसल जैपनीज इंसेफ्लाइटिस वायरस (JEV) Culex tritaeniorhynchus और Culex vishnui मच्छर के काटने से होता है। मच्छर की ये दोनों प्रजातियां भारत सहित पूरे एशिया में पाये जाते हैं। मैदानी इलाके इन मच्छरों के पनपने के लिए ज्यादा अच्छे माने जाते हैं क्योंकि वहां पानी ज्यादा जमा रहता है। ये कुआं, तालाब के अलावा शहरों में नालियों और अन्य जमा पानी के स्रोतों में भी पनपते हैं। खास बात यह भी है कि ये मच्छर यदि 300 आदमी को काटे, तो उनमें से सिर्फ एक आदमी को इंसेफ्लाइटिस होता है।

जैपनीज इंसेफ्लाइटिस के लक्षण

इसके शुरुआती लक्षण वायरल फीवर जैसा ही होता है। सिर दर्द, हाथ-पांव में जकड़न, मांसपेशियों में दर्द, हाथ या पांव का हिलते रहना आदि। हालांकि, इन्फेक्शन ज्यादा हो जाने पर हाथ, पांव पैरालाइसिस या फिर सिर्फ हाथ या पैर में या दायें या बायें हाथ और पैर में पैरालासिस हो सकता है। आदमी का दिमागी संतुलन बिगड़ सकता है और वह बेहोश होने के साथ कोमा में भी जा सकता है।

नहीं है कोई इलाज, वैक्सीन ही है उपाय

जैपनीज इंसेफ्लाइटिस का अब तक कोई इलाज नहीं है। हां, वैक्सीनेशन से इसके खतरे को दूर रखा जा सकता है। माना जाता है कि यह एक से 15 साल के बच्चों को ज्यादा प्रभावित करता है, पर पिछले एक दशक के डाटा के अनुसार यह अन्य आयुवर्ग में भी तेजी से फैल रहा है। बुजुर्गों और बच्चों में इसका खतरा अधिक होता है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम युवाओं की अपेक्षा कमजोर होता है। इसके मच्छर 8.2-28.9°C के तापमान में पनपते हैं और ठंडे मौसम में ज्यादा काटते हैं। इसलिए इससे बचने के लिए जैपनीज इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन उपलब्ध है। हालांकि,  मच्छर के काट लेने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है। यदि इसके काटने से बचपन में इंसेफ्लाइटिस हो जाये, तो बच्चा जीवनभर पैरेलाइसिस या अन्य दिमागी विकारों से ग्रसित रहता है। यूपी, बिहार, बंगाल और इधर कुछ सालों से झारखंड में भी इसके मामले काफी पाये जाने लगे हैं। इसलिए आस-पास साफ-सफाई करना जरूरी है। साथ ही खुले में पानी को जमने नहीं देना चाहिए। इसके मच्छर गंदे और साफ पानी दोनों जगह पनपते हैं।

 

 

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